केरल को देश का पहला ऐसा राज्य घोषित किया जा रहा है जो अत्यधिक गरीबी से मुक्त है। ऐसी सफलताएँ सामाजिक सुधार आंदोलनों के लंबे इतिहास, उच्च राजनीतिक भागीदारी और जनता द्वारा अपने अधिकारों के लिए निरंतर आग्रह का परिणाम होती हैं।
मैं कई राज्यों में रह चुकी हूं। भारत के हर राज्य की अपनी अनूठी भावना और अनूठा तरीक़ा है। लेकिन जब मैं पहली बार एक बाहरी व्यक्ति के रूप में केरल में गयी तो केरल की शक्तिशाली संस्कृति ने मुझे जो एहसास कराया उसकी कहीं से भी तुलना नहीं की जा सकती।
केरल में अपने पहले हफ़्ते में, मैं एक स्थानीय दुकान में गयी। मुझे मलयालम बिल्कुल नहीं आती थी। किराने का सामान खरीदने की कोशिश में बातचीत के दौरान मेरी ज़बान लड़खड़ा रही थी, और मैं “बाहरी” इंसान होने की चिंता से ग्रस्त थी। मुझे संघर्ष करते देख दुकानदार मुस्कुराया और टूटी-फूटी हिंदी में जवाब दिया, “आपको क्या चाहिए ?” मुझे तुरंत तसल्ली हुई।
विभाजनकारी बहसों के इस दौर में, उसकी भाषा बोलने में मेरी असमर्थता पर सवाल उठाने के बजाय, मेरी भाषा बोलने की उसकी इच्छा के उस छोटे से संकेत के रूप में केरल की जीवन-शैली की मुझे पहली झलक मिली थी।
हालाँकि केरल की आर्थिक वृद्धि दर कई बार ज्यादा औद्योगिक राज्यों की तुलना में पिछड़ी भी है, फिर भी मानव विकास पर इसके अनूठे जोर ने एक सशक्त मानदंड स्थापित किया है। इसने यह दिखाया है कि किसी समाज की प्रगति केवल उसके सकल घरेलू उत्पाद के आँकड़ों तक सीमित नहीं होती है।
केरल को देश का पहला ऐसा राज्य घोषित किया जा रहा है जो अत्यधिक गरीबी से मुक्त है। ऐसी सफलताएँ सामाजिक सुधार आंदोलनों के लंबे इतिहास, उच्च राजनीतिक भागीदारी और जनता द्वारा अपने अधिकारों के लिए निरंतर आग्रह का परिणाम होती हैं। केरल ने सामूहिक जनचेतना की एक ऐसी संस्कृति को जन्म दिया है, जो इस मूल विचार को सिद्ध करती है कि जब आप मानव गरिमा को प्राथमिकता देते हैं, तभी आप सभी के लिए एक बेहतर राज्य का निर्माण कर सकते हैं।
उदाहरण के लिए, केरल में एक गहरी सामाजिक समझ है कि नौकरी तो नौकरी ही होती है, चाहे वह उच्च-कुशलता वाली हो या निम्न-कुशलता वाली। मैं अपने घरेलू नौकरों, काम वाली दीदी या कचरा बीनने वाले भइया लोगों में यह भाव रोज़ाना देखती हूँ। यहाँ के स्थानीय लोगों के लिए यह महज एक पेशा होता है।
जबकि देश के कई अन्य हिस्सों में आपका पेशा आपकी सामाजिक प्रतिष्ठा तय करता है। यहाँ श्रमिकों की मजदूरी काफ़ी ज़्यादा है। यहां नियोक्ता-कर्मचारी संबंध को अधीनता के बजाय एक आपसी समझौते के रूप में देखा जाता है।
मैंने देखा है कि बिना किसी ऊंच-नीच के, बराबरी के स्तर पर बने इस पदानुक्रम की यह धारणा रोज़मर्रा के सार्वजनिक जीवन में गहराई से व्याप्त है। उदाहरण के तौर पर, मेरे संपन्न, उच्च शिक्षित मित्र पूरे विश्वास के साथ कहते हैं कि उनके बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ेंगे। यह दृष्टिकोण मेरे लिए एक बुनियादी अंतर को समझने की कुंजी था।
कई राज्यों में, सरकारी स्कूलों या अस्पतालों को गरीबों के लिए अंतिम सहारा माना जाता है, जिससे बुनियादी सेवाओं में गहरा वर्ग विभाजन पैदा होता है। जबकि यहाँ सार्वजनिक प्रणालियों को साझा सामुदायिक संपत्ति के रूप में देखा जाता है। चूँकि सभी आर्थिक पृष्ठभूमि के लोग इनका उपयोग करते हैं, इसलिए इनके मानकों को उच्च स्तर का बनाए रखने का सामूहिक दबाव भी होता है। और इस प्रकार, हर कोई इनका उपयोग करता रहता है।
यह एक ऐसी संस्कृति से उत्पन्न गुणवत्ता का एक सकारात्मक चक्र है, जो सभी के लिए बेहतर गुणवत्ता की माँग करता है, न कि केवल उन लोगों के लिए जो इसे वहन कर सकते हैं।
इसके अलावा, जागरूकता और नागरिकता की भावना यहां के समाज में सुदृढ़ता से स्थापित है। यह रोज़मर्रा के छोटे-छोटे पलों में भी दिखाई देती है। उदाहरण के तौर पर, कालीकट रेलवे स्टेशन के ऑटो स्टैंड पर लोग चुपचाप अपना नंबर आने का इंतज़ार करते हैं। यहाँ कोई तर्क-वितर्क नहीं होता, बस सामुदायिक मानदंडों के प्रति एक व्यवस्थित, अव्यक्त सम्मान होता है, जो एक साझा समझ से उपजा है।
यह जागरूकता एक समावेशी और धर्मनिरपेक्ष मानसिकता को भी बढ़ावा देती है। हाल ही में, मेरे यहां फ़र्नीचर का काम कर रहे बढ़ई राशिद ने एक बेहद अनौपचारिक बातचीत में कहा, “हम लोगों के साथ उनके धर्म के आधार पर भेदभाव करने में विश्वास नहीं रखते। हमारे लिए धर्म मायने नहीं रखता।” मैं उनकी इस स्पष्टता से कही गई बात से बहुत प्रभावित हुई।
केरल में, इंसानों को इंसान के रूप में स्वीकार करना लोगों के जीवन का हिस्सा बन चुका है। कट्टर पूर्वाग्रहों पर इंसानियत को तरजीह देने की इस क्षमता को राज्य की शैक्षिक बुनियाद से जोड़ा जा सकता है, जो राजनीतिक विकल्पों को आकार देने और एक अधिक उदार एवं तर्कसंगत समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
राज्य की साक्षरता दर लगातार 95 प्रतिशत से अधिक रही है। यह महज अक्षर ज्ञान नहीं है, बल्कि पढ़ना-लिखना है। केरल नीति आयोग के स्कूली शिक्षा गुणवत्ता सूचकांक में भी शीर्ष पर रहा है। शिक्षित जनसंख्या में नागरिक जागरूकता बढ़ती है तथा सामूहिक जिम्मेदारी की भावना भी प्रबल होती है।
मैं केरल के लिए एक बाहरी व्यक्ति थी, मैं कई राज्यों में रह चुकी हूं, और केरल में मैंने कई साल बिताए हैं। मुझे यह एहसास हुआ है कि जहाँ भारत के हर हिस्से की अपनी अनूठी आत्मा है, वहीं केरल की संस्कृति एक सशक्त कहानी प्रस्तुत करती है, जहाँ लोग एक-दूसरे की परवाह करते हैं, रुतबे से ज़्यादा चरित्र को महत्व देते हैं, और लोगों के विचारों और भावनाओं में खुलापन है। केरल में इंसानियत फल-फूल रही है, इसलिए वहां समाज भी फल-फूल रहा है।
(पायल आनंद, एसोसिएट प्रोफेसर, आईआईएम, कोझिकोड, केरल का लेख इंडियन एक्सप्रेस से साभार। अनुवाद : शैलेश।)